नालंदा विश्वविद्यालय भारतीय इतिहास की एक अमूल्य धरोहर है, जो प्राचीन काल से ज्ञान और शिक्षा का प्रतीक रहा है। यह दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय माना जाता है, जो सदियों पहले ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड जैसे संस्थानों से भी पहले स्थापित हुआ था। इस लेख में हम नालंदा के प्राचीन इतिहास से लेकर उसके विनाश, पुनरुत्थान और वर्तमान स्थिति तक की यात्रा पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह लेख ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है, जो विभिन्न स्रोतों से संकलित किए गए हैं।
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| नालंदा विश्वविद्यालय के प्राचीन खंडहर – विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय |
प्राचीन इतिहास: स्थापना और स्वर्ण युग
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 427 ईस्वी में गुप्त साम्राज्य के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम द्वारा की गई थी। यह बिहार के वर्तमान राजगीर के पास स्थित था, जो उस समय मगध क्षेत्र का हिस्सा था। नालंदा का नाम संस्कृत शब्द "नालंदा" से लिया गया है, जिसका अर्थ है "ज्ञान का दाता"। यह विश्वविद्यालय बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, लेकिन इसमें हिंदू दर्शन, जैन धर्म और अन्य विषयों पर भी अध्ययन होता था।नालंदा की स्थापना से पहले इस क्षेत्र का इतिहास बुद्ध और महावीर से जुड़ा हुआ है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, गौतम बुद्ध ने यहां कई बार प्रवास किया था, और महावीर भी इस क्षेत्र में ध्यान करते थे। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक ने यहां सारिपुत्र के चैत्य पर दान दिया और एक मंदिर बनवाया। लेकिन विश्वविद्यालय के रूप में इसका विकास गुप्त काल में हुआ।नालंदा का स्वर्ण युग 5वीं से 12वीं शताब्दी तक रहा। इस दौरान यह दुनिया का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र बना। यहां लगभग 10,000 छात्र और 2,000 शिक्षक रहते थे। छात्र चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, मंगोलिया, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया से आते थे। विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए कठोर परीक्षा होती थी, जहां द्वारपाल भिक्षु छात्रों की योग्यता जांचते थे।नालंदा में पढ़ाए जाने वाले विषयों में शामिल थे:- बौद्ध दर्शन (महायान और हीनयान)
- वेद, व्याकरण, दर्शनशास्त्र
- चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य
- गणित, खगोल विज्ञान (आर्यभट्ट जैसे विद्वान यहां जुड़े थे)
- कला, वास्तुकला, अनुवाद और धातु विज्ञान
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| नालंदा के विशाल पुस्तकालय – रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक |
विश्वविद्यालय में नौ मिलियन पुस्तकें थीं, जो तीन विशाल पुस्तकालयों- रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक- में रखी जाती थीं। ये पुस्तकालय बहुमंजिला इमारतें थीं। प्रसिद्ध विद्वान जैसे नागार्जुन, आर्यदेव, धर्मकीर्ति, शांतिदेव और चीनी यात्री ह्वेन सांग (जिन्होंने 7वीं शताब्दी में यहां अध्ययन किया) ने नालंदा की महिमा का वर्णन किया है। ह्वेन सांग के अनुसार, यहां का वातावरण इतना शांतिपूर्ण था कि कोई अपराध नहीं होता था। एक अन्य चीनी यात्री इत्सिंग ने भी नालंदा के मठवासी जीवन का विस्तृत वर्णन किया।
नालंदा को गुप्त, हर्षवर्धन (7वीं शताब्दी) और पाल वंश (8वीं से 12वीं शताब्दी) के शासकों का संरक्षण मिला। हर्षवर्धन ने यहां बड़े दान दिए और मंदिर बनवाए। पाल काल में यह धार्मिक मूर्तिकला का केंद्र बना। नालंदा ने बौद्ध धर्म को मध्य, पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया में फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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| 1193 ईस्वी में नालंदा विश्वविद्यालय का विनाश |
पतन और विनाश
नालंदा का पतन 12वीं शताब्दी में शुरू हुआ। 1193 ईस्वी में तुर्क-अफगान सेनापति मुहम्मद बख्तियार खिलजी ने बिहार पर आक्रमण किया और नालंदा को नष्ट कर दिया। खिलजी की सेना ने विश्वविद्यालय को लूटा और आग लगा दी। कहा जाता है कि पुस्तकालय इतने बड़े थे कि वे तीन महीने तक जलते रहे। कई विद्वान और भिक्षु मारे गए, जबकि कुछ तिब्बत भाग गए और वहां ज्ञान का प्रसार किया।इस आक्रमण के बाद नालंदा कभी पूरी तरह उबर नहीं सका। 1400 ईस्वी तक यह पूरी तरह परित्यक्त हो गया। खिलजी का आक्रमण बौद्ध शिक्षा के लिए एक बड़ा झटका था, क्योंकि उस समय बौद्ध धर्म भारत में कमजोर हो रहा था। नालंदा का विनाश दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति था, क्योंकि यहां संग्रहीत ज्ञान का अधिकांश भाग हमेशा के लिए नष्ट हो गया।
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| राजगीर स्थित आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय का हरित परिसर |
पुनराविष्कार और आधुनिक उत्थान
19वीं शताब्दी में ब्रिटिश पुरातत्वविद् फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन और बाद में अलेक्जेंडर कनिंघम ने नालंदा के खंडहरों की खोज की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1915 से खुदाई शुरू की, जिससे मठ, मंदिर और छात्रावास के अवशेष मिले। 2016 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया।आधुनिक नालंदा का पुनरुत्थान 2006 में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा प्रस्तावित किया गया। 2007 में पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (ईएएस) में 16 सदस्य देशों ने इसका समर्थन किया। 2010 में भारतीय संसद ने नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया, और 2014 में राजगीर में नए परिसर में पहला बैच शुरू हुआ। बिहार सरकार ने 455 एकड़ भूमि दी।नया नालंदा विश्वविद्यालय पर्यावरण-अनुकूल है- यह नेट-जीरो कार्बन फुटप्रिंट वाला कैंपस है, जिसमें 100 एकड़ जल निकाय और हरियाली है। प्रसिद्ध वास्तुकार पद्म विभूषण बी.वी. दोशी ने इसे डिजाइन किया, जो प्राचीन वास्तुशास्त्र को आधुनिक सुविधाओं के साथ जोड़ता है। विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर और शोध कार्यक्रम हैं, जो पर्यावरण अध्ययन, बौद्ध अध्ययन, इतिहास और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर केंद्रित हैं। यह एशियाई पुनर्जागरण का प्रतीक है और सभ्यताओं के बीच संवाद को बढ़ावा देता है।वर्तमान में (2026 तक), नालंदा विश्वविद्यालय पूरी तरह कार्यरत है। यह वैश्विक दृष्टि के साथ शिक्षा प्रदान करता है, और कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से समर्थन प्राप्त करता है। हाल के वर्षों में, यह जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और एशियाई विरासत पर शोध का केंद्र बन गया है।
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| चीनी यात्री ह्वेन सांग जिन्होंने 7वीं शताब्दी में नालंदा में अध्ययन किया |
निष्कर्ष
नालंदा विश्वविद्यालय ज्ञान की शाश्वत खोज का प्रतीक है। प्राचीन काल में यह दुनिया को रोशन करता था, और आज यह फिर से उभरकर वैश्विक शिक्षा में योगदान दे रहा है। इसका इतिहास हमें सिखाता है कि ज्ञान की रक्षा कितनी महत्वपूर्ण है, और विनाश के बाद भी पुनरुत्थान संभव है। नालंदा न केवल भारत की गौरवशाली विरासत है, बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रेरणा स्रोत है। यदि आप नालंदा के खंडहरों का दौरा करें, तो वहां की शांति और इतिहास आपको ज्ञान की गहराई का एहसास कराएगा।
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